- परमेश्वर के वचनों का एक भजन
- सृष्टिकर्ता के अधिकार का सच्चा मूर्तरूप
- I
- इंसान और कायनात दोनों की नियति
- जुड़ी हैं मज़बूती से सृष्टिकर्ता की प्रभुता से।
- अलग हो नहीं सकते कभी वे उसके अधिकार और योजना से।
- चीज़ों के नियमों के ज़रिये,
- जिन पर उसका प्रभुत्व है, जो योजनाएँ वो बनाता है उनसे,
- उसकी प्रभुता की सामर्थ्य को, उसकी व्यवस्था को, समझ पाता है इंसान।
- उसकी प्रभुता की सामर्थ्य को, उसकी व्यवस्था को, समझ पाता है इंसान।
- II
- हर चीज़ के जीवन-चक्र के ज़रिये, सचमुच देख पाता है इंसान,
- हर व्यवस्था परमेश्वर की, और कैसे पार कर जाते हैं वे
- धरती के नियमों को, पछाड़ देते हैं अन्य शक्तियों को।
- ज़िंदा रहने के नियमों, चीज़ों की नियति के ज़रिये,
- जानता है इंसान किस तरह करता है शासन परमेश्वर।
- सर्वोच्च है उसकी सत्ता।
- लाँघ नहीं सकता कोई प्राणी उसकी प्रभुता।
- बदल नहीं सकती कोई शक्ति चीज़ों की नियति को
- जो तय कर दी परमेश्वर ने।
- ज़िंदगी चलती और बढ़ती है युगयुगांतर उसकी व्यवस्था से।
- सृष्टिकर्त्ता के अधिकार का ये सच्चा मूर्त रूप है,
- सृष्टिकर्त्ता के अधिकार का ये सच्चा मूर्त रूप है।
- III
- हालाँकि देखता है इंसान, वास्तविक नियमों के ज़रिये,
- चीज़ों के लिये परमेश्वर के प्रभुत्व और विधान को,
- कितने हैं जो समझते हैं कायनात पर उसके प्रभुत्व को?
- कितने हैं जो जानकर, समर्पित हो सकते हैं
- अपनी नियति पर उसके नियंत्रण को?
- कौन सचमुच समझ सकता है इंसान की नियति है उसके हाथों में?
- "वचन देह में प्रकट होता है" से
- सम्पर्क करें:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया
- भजन के आॅडियो
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