शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

प्रायश्चित्त


  • प्रायश्चित्त
  •  
  • I
  • अच्छे इरादे, अंत के दिनों का मशवरा,
  • जगाते हैं गहरी नींद से इंसान को।
  • दर्दभरी यादें, बचे दाग़ यातना देते हैं मेरे ज़मीर को।
  • उलझन में, डरकर प्रार्थना करता हूँ मैं।
  • दिल पर हाथ रखकर प्रायश्चित्त करता हूँ मैं।
  • इतने दयालु हो तुम, मगर मिथ्या-प्रेम से छला है तुम्हें मैंने।
  • मेरी दुष्ट आत्मा को नहीं हुआ मलाल कोई, मलाल कोई।
  • पाप में जीता हूँ बेख़ौफ़ मैं। इससे बेपरवाह कि कैसा लगा तुम्हें।
  • सिर्फ तुम्हारा अनुग्रह चाहता हूँ। बेचैन होकर, ख़ुद पर दया खाकर,
  • अफसोस करता हूँ, मगर रुक नहीं पाता हूँ।
  • ख़ुद से धोखा, छिपा नहीं पाता हूँ।
  • II
  • इस बात से अनजान कि वफ़ादार हो तुम,
  • पूरी लगन से अपनी राह की तलाश की मैंने, तलाश की मैंने।
  • एक बार काम हो जाने पर तुम्हारा, कौन रोक सकता है तुम्हें?
  • आहें और मलाल रह जाते हैं बस।
  • पाप और दूषण में जीता हूँ। जुर्म का अहसास बढ़ता है दिल में मेरे।
  • सच्चे वचन ठहरते हैं मुझमें। नफरत है मुझे, कितना अधम हूँ मैं।
  • ख़ाली-हाथ तुम्हारे वचनों से रूबरू होता हूँ मैं।
  • तुम्हारे सामने कैसे आऊँ, शर्मिंदा हूँ मैं, शर्मिंदा हूँ मैं, शर्मिंदा हूँ मैं।
  •  
  • "मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से
  • Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-भजन के आॅडियो

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