मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा


  • परमेश्वर की इंसान से अंतिम अपेक्षा
  •  
  • I
  • अगर तू सेवा करने वाला है,
  • तो क्या वफादारी से कर सकता है सेवा परमेश्वर की,
  • बिना निष्क्रिय या बिना लापरवाह हुए?
  • जान ले तू अगर, कभी सराहता नहीं तुझे परमेश्वर,
  • जीवनभर सेवा करेगा फिर भी तू डटा रहकर?
  • तेरी तमाम कोशिशों के बावजूद अगर, बेपरवाह है तुझसे परमेश्वर,
  • क्या फिर भी काम करेगा तू उसके लिये गुमनामी में रहकर?
  • कुछ ख़र्च किया तूने परमेश्वर की ख़ातिर अगर,
  • पूरी नहीं हुईं छोटी-छोटी मांगें तेरी मगर,
  • तो क्या इल्ज़ाम देगा परमेश्वर को मायूस और नाराज़ होकर?
  • हमेशा वफादार है, प्यार करता है तू परमेश्वर से अगर,
  • फिर भी रोग सताते हैं, मुफलिसी में रहता है तू,
  • दोस्त भी त्याग देते हैं, दूर चले जाते हैं परिजन तुझसे,
  • या आ जाती है कोई और बदकिस्मती तुझ पर,
  • क्या फिर भी अटल रहेगी वफादारी, प्यार तेरा?
  • II
  • परमेश्वर जो काम करता है,
  • बिल्कुल मेल नहीं खाते हैं उनसे तेरे ख़्वाब अगर,
  • तो कैसे चलेगा तू अपने भविष्य के पथ पर?
  • नहीं मिलती हैं कभी भी वो चीज़ें तुझे अगर
  • जिनके पाने की आशा तूने परमेश्वर से की थी कभी
  • क्या फिर भी रह सकता है तू परमेश्वर का अनुयायी बनकर?
  • नहीं देखा है परमेश्वर के काम का
  • प्रयोजन और मायने तूने अगर,
  • बिना आंके, क्या उसका आज्ञापालन कर सकता है तू?
  • क्या सहेज सकता है वचन उसके, कही हैं जो बातें उसने,
  • तमाम काम वो जो किये हैं उसने इंसान के संग रहकर?
  • क्या बन सकता है वफादार अनुयायी परमेश्वर का तू,
  • सह सकता है दुख तू उसके लिये जीवनभर,
  • भले ही न मिले तुझे कुछ भी अगर?
  • क्या चल सकता है तू बिना विचार किये, बिना योजना बनाए,
  • या बिना तैयारी किये जीने के लिये अपने भविष्य पथ पर?
  • क्या ये कर सकता है तू परमेश्वर के लिये?
  •  
  • "वचन देह में प्रकट होता है" से
  • Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-भजन के आॅडियो

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