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शुद्ध कुँवारी और पवित्र आत्मिक देह के समर्पण के मायने हैं,
सच्चे हृदय को परमेश्वर के सम्मुख रखना।
इंसान के लिये, निर्मलता है परमेश्वर के सामने सच्चा हो पाना।
एक ही शर्त है पवित्र आत्मा के कार्य की:
अपने पूरे दिल से खोजना चाहिये इंसान को,
शक की नज़रों से न देखे परमेश्वर के काम को,
निभाए हर वक्त अपने फ़र्ज़ को।
हासिल किया जा सकता है सिर्फ इसी तरह, पवित्र आत्मा के काम को।