I
शुद्ध कुँवारी और पवित्र आत्मिक देह के समर्पण के मायने हैं,
सच्चे हृदय को परमेश्वर के सम्मुख रखना।
इंसान के लिये, निर्मलता है परमेश्वर के सामने सच्चा हो पाना।
एक ही शर्त है पवित्र आत्मा के कार्य की:
अपने पूरे दिल से खोजना चाहिये इंसान को,
शक की नज़रों से न देखे परमेश्वर के काम को,
निभाए हर वक्त अपने फ़र्ज़ को।
हासिल किया जा सकता है सिर्फ इसी तरह, पवित्र आत्मा के काम को।
II
परमेश्वर के कार्य के हर कदम में,
अगाध आस्था होनी चाहिये इंसान की,
और खोजना चाहिये उसे परमेश्वर के सामने।
सिर्फ़ अनुभव के ज़रिये, परमेश्वर की प्रियता को पा सकता है इंसान,
कैसे कार्य करता है पवित्र आत्मा, देख सकता है इंसान।
अनुभव नहीं करते हो तुम अगर,
अपने मार्ग को इसके ज़रिये महसूस नहीं करते हो तुम अगर,
तो कुछ हासिल नहीं कर पाओगे, नहीं खोजते हो तुम अगर।
चूँकि अपने अनुभव से ही तुम परमेश्वर के कर्मों को देख पाओगे,
कितना अद्भुत है, कितना अथाह है वो, ये देख पाओगे।
III
यही सच्चा रास्ता है, चूँकि ये यकीन है तुम्हें,
अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिये तुम्हें,
बनाए रखनी चाहिये अपनी भक्ति परमेश्वर के लिये।
चूँकि देखा है तुमने,
परमेश्वर स्वयं आया है धरती पर पूर्ण करने तुम्हें,
तुम्हें अपना हृदय पूरी तरह से दे देना चाहिये।
वो कुछ भी करे चाहे, तुम्हारा परिणाम बुरा हो चाहे,
फिर भी कर सकते हो तुम उसका अनुसरण सदा।
यही है बनाए रखना निर्मलता।
एक प्राणी के फ़र्ज़ को पूरा करो,
परिणाम चाहे कुछ भी हो,
परमेश्वर को जानने की खोज करो, और उसे प्रेम करो,
जैसे चाहे परमेश्वर तुम से बर्ताव करे, कभी शिकायत न करो।
"वचन देह में प्रकट होता है" से
Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया
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