मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना
और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन
मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना
और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन
किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचनों को कहा और भविष्यवक्ताओं के जरिए कुछ कार्य किया। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य के एवज़ में खड़ा हो सकता था, और दर्शी लोग उसके स्थान पर आने वाली बातों को बता सकते थे और कुछ स्वप्नों का अनुवाद कर सकते थे। आरम्भ में किया गया कार्य सीधे तौर पर मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और मनुष्य के पाप से सम्बन्धित नहीं था, और मनुष्य से सिर्फ व्यवस्था में बने रहने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा ने देहधारण नहीं किया और स्वयं को मनुष्य पर प्रगट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा एवं
अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, तथा उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मानवजाति के मध्य सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य के नेतृत्व का था। यह शैतान के साथ युद्ध का आरम्भ था, परन्तु यह युद्ध अभी तक आधिकारिक रूप से शुरू नहीं हुआ था। परमेश्वर के पहले देहधारण के साथ ही शैतान के साथ आधिकारिक युद्ध का आरम्भ हो गया था, और यह आज के दिन तक निरन्तर जारी है। इस युद्ध का पहला उदाहरण तब सामने आया जब देहधारी परमेश्वर को क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था। देहधारी परमेश्वर के क्रूसारोहण ने शैतान को पराजित कर दिया था, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में सीधे तौर पर कार्य करना आरम्भ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी, और क्योंकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य है, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। कार्य का यह चरण जिसे आरम्भ में यहोवा के द्वारा किया गया था वह महज पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का नेतृत्व था। यह परमेश्वर के कार्य का आरम्भ था, और हालाँकि इसमें अब तक किसी युद्ध, या किसी मुख्य कार्य को शामिल नहीं गया था, फिर भी इसने उस आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी। बाद में, अनुग्रह के युग के दौरान दूसरे चरण के कार्य में मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल था। जिसका अर्थ है कि स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में कार्य किया था। इसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत तौर पर किया जाना था: यह अपेक्षा करता था कि परमेश्वर व्यक्तिगत तौर पर देहधारण करे, और यदि वह देहधारण नहीं करता, तो कार्य के इस चरण में कोई अन्य प्राणी उसका स्थान नहीं ले सकता था, क्योंकि यह शैतान के साथ सीधी लड़ाई के कार्य को दर्शाता था। यदि मनुष्य ने परमेश्वर के स्थान पर यह काम किया होता, तो जब मनुष्य शैतान के सामने खड़ा होता, शैतान ने समर्पण नहीं किया होता और उसे हराना असंभव हो गया होता। यह तो देहधारी परमेश्वर ही था जो उसे हराने के लिए आया था, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का मूल-तत्व अब भी परमेश्वर है, वह अभी भी मनुष्य का जीवन है, और वह अभी भी सृष्टिकर्ता है; चाहे जो भी हो, उसकी पहचान एवं मूल-तत्व कभी नहीं बदलेगा। और इस प्रकार, उसने शैतान के सम्पूर्ण समर्पण को अंजाम देने के लिए देह को पहना लिया और कार्य किया। अंतिम दिनों के कार्य के चरण के दौरान, यदि मनुष्य को यह कार्य करना होता और सीधे तौर पर वचनों को बोलना होता, तो वह उन्हें बोलने में असमर्थ होता, और यदि भविष्यवाणी के वचन को कहा जाता, तो यह मनुष्य पर विजय पाने में असमर्थ होता। देह का रूप लेने के द्वारा, परमेश्वर शैतान को हराने और उसके सम्पूर्ण समर्पण को अंजाम देने के लिए आया है। वह पूरी तरह से शैतान को पराजित करता है, पूरी तरह से मनुष्य पर विजय पाता है, और पूरी तरह से से मनुष्य को प्राप्त करता है, जिसके बाद कार्य का यह चरण पूरा हो जाता है, और सफलता को हासिल किया जाता है। परमेश्वर के प्रबधंन में, मनुष्य परमेश्वर के एवज़ में खड़ा नहीं हो सकता है। विशेष तौर पर, युग की अगुवाई करने और नए कार्य को प्रारम्भ करने के कार्य को स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत तौर किये जाने की तो और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकाशन देने और उसे भविष्यवाणी प्रदान करने के कार्य को मनुष्य के द्वारा किया जा सकता है, परन्तु यदि यह ऐसा कार्य है जिसे व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर के द्वारा ही किया जाना चाहिए, अर्थात् स्वयं परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध का कार्य, तो मनुष्य के द्वारा इस कार्य को नहीं किया जा सकता है। कार्य के पहले चरण के दौरान, जब शैतान के साथ कोई युद्ध नहीं था, तब यहोवा ने भविष्यवक्ताओं के द्वारा बोली गई भविष्यवाणियों का उपयोग करते हुए व्यक्तिगत तौर पर इस्राएल के लोगों की अगुवाई की थी। इसके बाद, कार्य का दूसरे चरण शैतान के साथ युद्ध था, और स्वयं परमेश्वर ने व्यक्तिगत तौर पर देहधारण किया था, और इस कार्य को करने के लिए देह में आया था। कोई भी कार्य जो शैतान के साथ युद्ध को शामिल करता है वह परमेश्वर के देहधारण को भी शामिल करता है, जिसका अर्थ है कि इस युद्ध को मनुष्य के द्वारा नहीं लड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य को युद्ध करना पड़ता, तो वह शैतान को पराजित करने में असमर्थ होता। उसके पास उसके विरुद्ध लड़ने की ताकत कैसे हो सकती है जबकि वह अभी भी उसके प्रभुत्व के अधीन है? मनुष्य बीच में है: यदि आप शैतान की ओर झुकते हैं तो आप शैतान के हैं, परन्तु यदि आप परमेश्वर को संतुष्ट करते हैं तो आप परमेश्वर के हैं। यदि इस युद्ध के कार्य में मनुष्य को परमेश्वर के एवज़ में खड़ा होना पड़ता, तो क्या वह युद्ध कर पाता? यदि वह युद्ध करता, तो क्या वह बहुत पहले ही नष्ट नहीं हो जाता? क्या वह बहुत पहले ही अधोलोक में नहीं समा गया होता? और इस प्रकार, परमेश्वर के कार्य में मनुष्य उसका स्थान लेने में असमर्थ है, कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के पास परमेश्वर का मूल-तत्व नहीं है, और यदि आप शैतान के साथ युद्ध करते तो आप उसे पराजित करने में असमर्थ होते। मनुष्य केवल कुछ कार्य ही कर सकता है; वह कुछ लोगों को जीत सकता है, परन्तु वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर के एवज़ में खड़ा नहीं हो सकता है। मनुष्य शैतान के साथ युद्ध कैसे कर सकता है? इससे पहले कि आप शुरुआत करते शैतान आपको बन्दी बना लेता। केवल स्वयं परमेश्वर ही शैतान के साथ युद्ध कर सकता है, और इस आधार पर मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण एवं उसकी आज्ञाओं का पालन कर सकता है। केवल इसी रीति से मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह शैतान के बन्धनों से बचकर निकल सकता है। जो कुछ मनुष्य अपनी स्वयं की बुद्धि, अधिकार एवं योग्यताओं से हासिल कर सकता है वह बहुत ही सीमित होता है; वह मनुष्य को पूर्ण बनाने, उसकी अगुवाई करने, और इसके अतिरिक्त, शैतान को हराने में असमर्थ है। मनुष्य की मानसिक क्षमता एवं बुद्धि शैतान की युक्तियों को बाधित करने में असमर्थ है, अतः मनुष्य किस प्रकार से उस के साथ युद्ध कर सकता है?
वे सभी लोग जो सिद्ध किये जाने की इच्छा रखते हैं उनके पास सिद्ध बनने का एक अवसर है, अतः हर किसी को शांत हो जाना चाहिए: भविष्य में आप उस मंज़िल में प्रवेश करेंगे। परन्तु यदि आप सिद्ध बनाए जाने की इच्छा नहीं रखते हैं, और उस बेहतरीन आयाम में प्रवेश करने की इच्छा नहीं रखते हैं, तो यह आपकी स्वयं की समस्या है। वे सभी जो सिद्ध बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और जो परमेश्वर के प्रति वफादार हैं, वे सभी जो आज्ञाओं को मानते हैं, और वे सभी जो वफादारी से अपने कार्य को क्रियान्वित करते हैं – ऐसे सभी लोगों को सिद्ध बनाया जा सकता है। आज, वे सभी लोग जो वफादारी से अपने अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं, वे सभी जो परमेश्वर के अधीन नहीं होते हैं, विशेष रूप से वे जिन्होंने पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन एवं अद्भुत ज्योति प्राप्त की है किन्तु उसे अभ्यास में नहीं लाते हैं – ऐसे सभी लोगों को सिद्ध नहीं बनाया जा सकता है। वे सभी लोग जो वफादार होने और परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा रखते हैं, भले ही वे थोड़े से अज्ञानी हैं; वे सभी जो अनुसरण करने की इच्छा रखते हैं उन्हें सिद्ध बनाया जा सकता है। इसके विषय में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब तक आप इस दिशा में अनुसरण करने के इच्छुक हैं, आपको सिद्ध बनाया जा सकता है। मैं आप लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निष्कासित करने के लिए इच्छुक नहीं हूँ, परन्तु यदि मनुष्य अच्छा करने के लिए परिश्रम न करे, तो आप सिर्फ अपने आपको बर्बाद कर रहे हैं; वह मैं नहीं हूँ जो आपको निष्कासित करता है, परन्तु आप स्वयं हो। यदि आप स्वयं अच्छा करने के लिए परिश्रम न करें – यदि आप आलसी हैं, या अपने कर्तव्य नहीं निभाते हैं, या वफादार नहीं हैं, या सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और हमेशा जैसा चाहते हैं वैसा ही करते हैं, धन खर्च करते हैं और लैंगिक सम्बन्ध बनाते हैं, तो आप स्वयं को दोषी ठहराते हैं, और किसी की दया के अयोग्य हैं। मेरा उद्देश्य आप सभी लोगों के लिए है कि आप सब सिद्ध बनें, और इस बात की बहुत कम इच्छा करता हूँ कि आप पर विजय पाया जाए, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे सिद्ध बनाया जाए, अन्ततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, और उसके द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं ने आप लोगों को पिछड़ा हुआ कहा या निम्न क्षमता वाला – यह सब प्रमाणित सत्य है। मेरा ऐसा कहना यह सिद्ध नहीं करता है कि मैं ने आपको छोड़ने का इरादा किया है, कि मैंने आप लोगों में आशा खो दी है, और मैं आप लोगों को बचाने की इच्छा बिलकुल भी नहीं करता हूँ। आज मैं आप सब के उद्धार के कार्य को करने के लिए आया हूँ, कहने का तात्पर्य है कि वह कार्य जिसे मैं करता हूँ वह उद्धार के कार्य की निरन्तरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध किये जाने का एक मौका है: बशर्ते आप तैयार हों, बशर्ते आप अनुसरण करते हों, तो अन्त में आप प्रभावों को हासिल करने में सक्षम होंगे, और आप में से किसी को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि आप निम्न क्षमता के इंसान हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं आपकी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी, यदि आप उच्च क्षमता के इंसान हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं आपकी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि आप अज्ञानी एवं निरक्षर (अनपढ़) हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं आपकी निरक्षरता के स्तर के अनुसार होंगी; यदि आप साक्षर हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं आपकी साक्षरता के स्तर के अनुसार होंगी; यदि आप वृद्ध हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं आपकी उम्र के अनुसार होंगी; यदि आप अतिथि सत्कार करने में समर्थ हैं, तो आप से मेरी अपेक्षाएं इसके अनुसार होंगी; यदि आप कहते हैं कि आप अतिथि सत्कार नहीं कर सकते हैं, और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हैं, चाहे यह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो, या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य हो, या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य हो, मेरे द्वारा आपकी सिद्धता भी उस कार्य के अनुसार होगी जिसे आप करते हैं। वफादार होना, अन्त तक आज्ञा मानना, और परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम का अनुसरण करना - यही वह कार्य है जिसे आपको पूरा करना होगा, और इन तीन चीज़ों की अपेक्षा अभ्यास करने के लिए और कोई बेहतर चीज़ नहीं है। अन्ततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को हासिल करे, और यदि वह इन तीन चीज़ों को हासिल कर सकता है तो उसे सिद्ध बनाया जाएगा। परन्तु, इन सबसे ऊपर, आपको सचमुच में अनुसरण करना होगा, आपको सक्रियता से ऊपर और नीचे बढ़ते जाना होगा, उसके प्रति निष्क्रिय नहीं होना होगा, मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास सिद्ध बनाए जाने का एक अवसर है, और प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध बनाए जाने के योग्य है, और यह मायने रखता है, परन्तु यदि आप अपने अनुसरण में बेहतर बनने की कोशिश नहीं करते हैं, यदि आप इन तीनों मापदंडों को हासिल नहीं करते हैं, तो अन्त में आप ज़रूर निष्कासित होंगे। मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस स्तर तक पहुंचे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य एवं अद्भुत प्रकाशन हो, और वह अन्त तक आज्ञा मानने में सक्षम हो, क्योंकि यह वह कर्तव्य है जिसे आप लोगों में से प्रत्येक को निभाना है। जब आप सभी लोग अपने कर्तव्य को निभा लेते हैं, तो आप सभी लोगों को सिद्ध बनाया जा चुका होगा, आप लोगों के पास भी गूंजायमान गवाही होगी। वे सभी लोग जिनके पास गवाही है वे ऐसे लोग हैं जो शैतान के ऊपर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा को प्राप्त किया है, और वे ऐसे लोग हैं जो उस बेहतरीन मंज़िल में जीवन बिताने के लिए बने रहेंगे।

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