- कलीसिया का भजन
- आत्म-मंथन से मिलता है मार्ग मुझे अनुसरण का
- I
- पूरी तरह परमेश्वर का अनुसरण करके आज तक,
- जाना मैंने प्रेम है परमेश्वर।
- मेरे ग़मों में, मेरी नाकामियों में,
- दिलासा देते हैं मुझे परमेश्वर के वचन।
- देखकर परमेश्वर के वचनों के ज़रिये ख़ुद को,
- जाना मैंने गहरी है भ्रष्टता मेरी।
- जड़ें गहरी हैं मेरे शैतानी स्वभाव की,
- इसकी वजह से पाप में रहता हूँ मैं।
- II
- मग़रूर हूँ, अभिमानी हूँ, झूठा हूँ, कपटी हूँ,
- इंसान के समान गुण नहीं हैं मुझमें।
- अपनी मर्ज़ी से काम करता हूँ मैं,
- शायद ही कभी सत्य का अभ्यास करता हूँ मैं।
- उसूल नहीं हैं कोई मेरे कामों के,
- मगर लगता है मुझे सत्य की हकीकत है मुझमें।
- महज़ पाखण्डी हूँ मैं,
- परमेश्वर की बिल्कुल नहीं मानता हूँ मैं।
- III
- हैसियत और शोहरत पर ही
- रहता है पूरा ध्यान मेरा।
- सतही है जीवन में प्रवेश मेरा।
- मुझमें नहीं है वो हौसला,
- जो पतरस में था
- इतना शर्मिंदा हूँ कि शब्द नहीं हैं,
- इतना शर्मिंदा हूँ कि शब्द नहीं हैं।
- IV
- इम्तहानों और मुसीबतों से हो गया साबित,
- मुझमें परमेश्वर के लिये प्यार नहीं है।
- मुझे परवाह है बस अपनी देह की,
- मुझे परमेश्वर की ज़रा भी परवाह नहीं है।
- मुझे गिरफ़्तारी की यातना का ख़ौफ़ है,
- मुझे यहूदा की तरह बन जाने का ख़ौफ़ है।
- मुझे मौत का ख़ौफ़ है,
- अधम ज़िंदगी जी है मैंने।
- V
- सच्चाइयों के उजागर होने से,
- अपना असली कद देखा है मैंने।
- सत्य की हकीकत के बग़ैर,
- यकीनन दग़ा दे दूँगा परमेश्वर को मैं।
- दिल में बग़ैर परमेश्वर के प्रेम के,
- ख़ुद को कैसे अर्पित करता, परमेश्वर की मानता मैं?
- बरसों की आस्था मेरी सत्य के लिये नहीं,
- इसका मलाल है मुझे।
- VI
- पीड़ाओं, यातनाओं, इम्तहानों के ज़रिये
- उजागर हुए जो,
- उन ख़तरनाक हालात को
- अपनी नज़रों से देखता हूँ मैं।
- सत्य की वास्तविकता के बग़ैर,
- कैसे दे सकता हूँ मज़बूत गवाही मैं?
- कैसे दे सकता हूँ मज़बूत गवाही मैं?
- VII
- इम्तहानों, शुद्धिकरण, व्यवहार और काट-छाँट ने,
- उजागर कर दिया मुझे और मेरे कामों को।
- सिद्धांतों की व्याख्या करता हूँ मैं
- ख़ुद को बचाने के लिये बहाने बनाता हूँ मैं।
- छल-कपट दिल में लेकर,
- सचमुच कैसे ईमानदार हो सकता हूँ मैं?
- विचार करता हूँ तो पाता हूँ, बरसों की आस्था के बावजूद,
- ज़्यादा नहीं बदला है स्वभाव मेरा।
- VIII
- मूर्ख हूँ जो खोज नहीं की सत्य की,
- फिर भी राज्य में प्रवेश चाहता हूँ मैं!
- निष्ठावान है, धार्मिक है स्वभाव परमेश्वर का,
- बिना सत्य के परमेश्वर द्वारा, बाहर कर दिया जाऊँगा मैं।
- बहुत कमियाँ हैं मुझमें,
- शुद्ध नहीं हुआ है भ्रष्ट स्वभाव मेरा।
- बिना सत्य का अनुसरण किये,
- बरसों विश्वास रखा परमेश्वर में मैंने,
- यही वजह है इतना दयनीय हो गया हूँ मैं।
- IX
- बिना आत्म-मंथन के, कैसे जान पाता
- कि पौलुस के पथ पर चल रहा हूँ मैं?
- पतरस की तरह बनने का,
- परमेश्वर को प्रेम करने का
- परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का संकल्प लेता हूँ मैं,
- संकल्प लेता हूँ मैं।
- अनुशंसित:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया
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