किसी सृजित प्राणी में नहीं होता परमेश्वर का प्रेम
- I
- जीवन से पूर्ण होते हैं परमेश्वर के वचन,
- दिखाते हैं वो राह जिस पर चलना चाहिये हमें,
- कराते हैं सत्य का बोध हमें।
- खिंचने लगते हैं उसके वचनों की ओर हम।
- गौर करने लगते हैं, उसके लहजे और बोलने के अंदाज़ पर हम,
- और ख़्याल करने लगते हैं जान-बूझकर,
- इस सामान्य व्यक्ति की भीतरी आवाज़ का हम।
- II
- हमारे लिये दिलो-जान से काम करता है परमेश्वर,
- हमारे लिये न सो पाता है, न खा पाता है परमेश्वर;
- हमारे लिये आँसू बहाता है, आहें भरता है,
- हमारे लिये रोग में कराहता है परमेश्वर।
- हमारी मंज़िल और उद्धार के लिये, अपमान सहता है परमेश्वर,
- हमारे विद्रोहीपन और संवेदनहीनता पर,
- उसका दिल दुखी होता है, आँसू बहाता है।
- III
- उसका स्वरूप और स्वभाव किसी सामान्य इंसान में नहीं होता है।
- न ही उन्हें कोई दूषित इंसान धारण या हासिल कर सकता है।
- उसकी सहनशीलता और धीरज, किसी सामान्य इंसान में नहीं होता है,
- और उसके जैसा प्रेम, किसी सृजित प्राणी में नहीं होता है।
- "वचन देह में प्रकट होता है" से
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